दहशत की गर्द में अक्सर चेहरे धुंधले पड़ जाते हैं. सुर्खियाँ नामों के फर्क मिटा देती हैं और नज़रें सिर्फ़ लोगों को देखती हैं, इन्सानों को नहीं. दिल्ली बम धमाकों के बाद आजमगढ़ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ लेकिन यहाँ हम उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ की नहीं बल्कि मुंबई के बीच बसे एक ऐसे आजमगढ़ की बात कर रहे हैं जो सिर्फ़ इसलिए भय और आतंक के माहौल में जी रहा है क्योंकि यहाँ के ज्यादातर बाशिंदों के पुरखों ने कई बरस पहले आजमगढ़ से मुंबई आकर इसी जगह अपना बसेरा डाला था.कुर्ला की पतली- पतली गलियों में से एक गली है यह...इतनी पतली कि किसी ने इसे नाम देने काबिल भी न समझा. दूर मुहाने पर पान की दुकान है जहाँ कुछ उम्रदराज़ लोग अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं. यहीं एक सस्ते स्टीरियो पर बज रहा है कैफी आज़मी साहब का लिखा नगमा... "वक्त ने किया क्या हसीं सितम..." फ़िल्म - 'कागज़ के फूल. और ये हैं अब्दुल्ला आलम... आजमगढ़ से रिश्तों के गुनाह के सज़ा क्या होती है यह जानना हो तो इस शख्स के बयां पर गौर करिए. जब से धमाकों और आजमगढ़ के नापाक रिश्तों की कहानियाँ सामने आई हैं सिर्फ़ उत्तरप्रदेश का आजमगढ़ ही नहीं, मुंबई के कुर्ला इलाके का यह मोहल्ला भी पुलिस के राडार पर दिखाई देने लगा है. पिछले दिनों मुंबई पुलिस ने यहाँ से ऐसे कई लोगों को पूछताछ के लिए उठा लिया जिनकी जड़ें कहीं न कहीं उसी आजमगढ़ से जुड़ी हुए थी जिसे अब एक तबका आतंकगढ़ के तौर पर कहने- सुनने लगा है... अब्दुल्ला आलम के भाई अफज़ल को पुलिस ने जब आधी रात के बाद उसके घर से उठाया तो अगले दो दिन पुरे परिवार को सेहरी और इफ्तार सिर्फ़ रस्म भर बची थी...हालाँकि दो दिन बाद पुलिस ने अफज़ल को छोड़ दिया लेकिन न सिर्फ़ उसके परिवार बल्कि पुरे मुहल्ले में खौफ का वो आलम अब भी साफ़ पसरा हुआ दिखाई देता है.....इस बस्ती को कई दशक पहले मुंबई आए आजमगढ़ के बाशिंदों ने बसाया था और दिल्ली में हुए धमाकों तक सब कुछ ठीक भी चल रहा था लेकिन अचानक सब कुछ बदल गया... लोगों का दर्द यह है कि कुछ लोगों की करतूतों के लिए पूरे इलाके और शहर को संदेह के नज़रिए से देखा जा रहा है.इलाके के कार्पोरेटर अशरफ आज़मी कहते हैं- ज़ख्मी भी हम हैं..शर्मिंदा भी हम...ज़लील भी हम और जालिम भी हम.... ये कैसा वक्त है.
सिर्फ़ आजमगढ़ से रिश्ते के नाम पर पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन बुलाने का ये सिलसिला एक-दो परिवारों तक नहीं सिमटा है, और भी कई लोग है जिन्हें अपनी रातें कुर्ला की इन रंगीन गलियों के बजाय पुलिस स्टेशन के साए में गुजारनी पडी. आजमगढ़ का ये खौफ सिर्फ़ यहीं तक नहीं पसरा है. इलाके के एक मौलवी जब रिजर्वेशन करवाने विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन पहुंचे तो उन्हें सिर्फ़ इसलिए तलाशी देनी पडी क्योंकि वे आजमगढ़ के लिए रिजर्वेशन कराने गए थे. कुछ न मिलने पर हालाँकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया.
इस सब के बीच अहम् बात ये है इलाके के रसूखदार लोग इस बात के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे हैं कि यदि पुलिस उन्हें बुलाती है तो उन्हें अपनी सचाई पुलिस के सामने रखनी चाहिए...शायद यही कारण रहा कि पुलिस भी परेशान करने के बजाय उन लोगों को छोड़ रही है जिन पर उसे कोई शुबहा नहीं. लेकिन रमज़ान के इस पाक महीने में कुर्ला की इन तंग गलियों में डर लगभग हर चेहरे पर साफ़ झलक आता है. आजमगढ़ की बात छिड़ते ही या तो लोग कन्नी काटने लगते हैं या कुछ इस तरह सहम जाते हैं. इन्हीं चेहरों में ज्यादातर चेहरे ऐसे भी मिल जायेंगे जो दहशतगर्दों के ईमान पर सवाल उठाने से भी कतई नहीं झिझकते. ठेठ आजमगढ़ के इकबाल हाशमी कहते हैं- रमजान के पाक महीने में ऐसा करने वाले इस्लाम को मानने वाले हो ही नहीं सकते. कुर्ला के इन आज़मियों की सबसे बड़ी मुश्किल यह है की उन्हें एक ऐसे गुनाह का इल्जाम झेलने के लिए ख़ुद को हर रोज़ तैयार करना पड़ता है जिसमे खून भी शायद उन्ही के किसी अपने का गिरा हो...मुंबई के इस छोटे आजमगढ़ की शायद यही त्रासदी है.
( यह सितम्बर, ०८ में तब लिखा गया था जब दिल्ली में हुए विस्फोटों के बाद आजमगढ़ और मुंबई में आजमगढ़ के लोगों पर पुलिस को शुबहा होने लगा था).
मंगलवार, 11 नवंबर 2008
ये ख़बर नहीं ...!
उन सारे दोस्तों के लिए जो ज़िन्दगी में कहीं न कहीं दूर हो गए...उन पलों के लिए जिन्हें कभी छोड़ना नहीं चाहता था...अच्छी बात ये है कि ना वे दोस्त, ना ही वे पल ख़बर हैं...!
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